नईमा उप्रेती का देहावसान : नृत्य, नाटक और संगीत के एक युग का अंत..! - UK News Network

उत्तराखंड

नईमा उप्रेती का देहावसान : नृत्य, नाटक और संगीत के एक युग का अंत..!

 नईमा खान उप्रेती की मृत्यु के साथ.उत्तराखंड की लोक कला -नृत्य ,नाटक और संगीत के एक गौरवशाली युग का अंत हो गया.!

नईमा वर्तमान में पर्वतीय कला केन्द्र दिल्ली की अध्यक्ष थी ।

प्रमोद शाह

कल 15 जून 2018 नईमा खान उप्रेती की मृत्यु के साथ.उत्तराखंड की लोक कला -नृत्य ,नाटक और संगीत के एक गौरवशाली युग का अंत हो गया..नईमा वर्तमान में पर्वतीय कला केन्द्र दिल्ली की अध्यक्ष थी ।और लंबे समय से बीमारी से जूझ रही थी
नईमा का मोहन उप्रेती के बगैर और स्वर्गीय मोहन उप्रेती का नईमा के बगैर परिचय अधूरा है ।

स्व०मोहन उप्रेती और नईमा की परिचय की डोर सन 70 के दशक के शुरुआती साल ,जब भरतनाट्यम के शिखर पुरूष पंडित उदयशंकर अल्मोड़ा प्रवास में थे और सिटोली के जंगलों /गांव से निकलकर एक बेहतरीन नृत्यांगना जिन्होंने स्वर्गीय उदयशंकर से तालीम हासिल..। यहीं पर नाटक और संगीत के मर्मज्ञ स्वर्गीय मोहन उप्रेती और नईम खान का रूहानी संयोग बना, शहर अल्मोडा को यह संयोग बहुत रास नही आया..।

कालांतर में मोहन उप्रेती, नईमा और नाटककार लेनिन पंत दिल्ली पहुंच गए। मोहन उप्रेती जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में ड्रामेटिक म्यूजिक के प्रोफेसर थे। तभी उनके द्वारा पर्वतीय कला ,नाटक और संगीत को प्रोत्साहन देने के लिए ” पर्वतीय कला केंद्र “की स्थापना की ।पर्वतीय कला केंद्र ने 50 महत्वपूर्ण नाटक 15 दूरदर्शन नाटक और सीरियल मे अपना योगदान किया और 22 विदेशी मुल्कों में इन रचनाओं की प्रस्तुति की गई । जिनमे कालिदास रचित “मेघदूत “नृत्य नाटिका बेहद लोकप्रिय हुई पर्वतीय कला केंद्र द्वारा प्रदर्शित अमीर खुसरो तथा संगीत नाटक “इन्द्र सभा” भी बेहद लोकप्रिय हुए .. पर्वतो की लोकगाथाओं को नाटक के रुप मे मंच पर लाने का एतिहासिक कार्य भी पर्वतीय कला मंच ने किया..एक दर्जन से अधिक गुम होती लोकगाथाओं को मंच दिया..जिनमे “गोरिया ” राजूला -मालूशाही आदि मुख्य हैं

प्रसिद्ध कुमाउनी गीत “‘बेडू पाको बाहमासा…हो नरैण काफल पाको चैता..मेरी छैला.।
को आधुनिक स्वरूप में संगीत और स्वर देकर ,स्वर्गीय मोहन उप्रेती ने अन्तर्राष्ट्रीय पहचान दी.।और .जब यह गीत दिल्ली मे गाया तो स्व०प्रधानमंत्री ज्वाहर लाल नेहरू झूम उठे..।
मोहन उप्रेती 5 जून 1997 को मृत्यु के बाद, नईमा की रूह मे जिन्दा थे। जो उन्ही के रुहानी मार्गदर्शन मे पर्वतीय कला केन्द्र को गरिमा पूर्वक बतौर अध्यक्ष संचालित कर रही थी..
नईमा खान उप्रेती का यूं चला जाना.. -उत्तराखंड की लोक कला – संगीत और नृत्य की शानदार परम्परा का भी अवसान जैसा है।


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