उत्तराखंड में Forest Fire रोकने के लिए सरकार का बड़ा एक्शन प्लान..
आग बुझाने वालों को मिलेगा इनाम..
उत्तराखंड: उत्तराखंड में जंगलों को आग से बचाने के लिए सरकार ने इस बार व्यापक रणनीति के साथ जनभागीदारी पर विशेष फोकस किया है। राज्य सरकार का कहना है कि वनाग्नि की घटनाओं पर नियंत्रण केवल विभागीय प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसमें स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सबसे अहम भूमिका निभा सकती है। इसी दिशा में ग्राम स्तर पर गठित वनाग्नि प्रबंधन समितियों को आर्थिक सहायता देने के साथ-साथ उत्कृष्ट कार्य करने वाले लोगों और समूहों को सम्मानित करने की योजना शुरू की गई है। प्रदेश के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि राज्यभर में गठित 496 वनाग्नि प्रबंधन समितियों को 30-30 हजार रुपये की सहायता राशि दी जा रही है, ताकि गांव स्तर पर आग की घटनाओं को रोकने और समय रहते नियंत्रण के प्रयास मजबूत किए जा सकें। इसके साथ ही सरकारी और निजी स्तर पर वन संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान देने वाले व्यक्तियों और समूहों को पुरस्कृत भी किया जाएगा। प्रत्येक जिले में दो अलग-अलग श्रेणियों में तीन-तीन पुरस्कार दिए जाएंगे, जिनमें एक लाख, 75 हजार और 50 हजार रुपये की धनराशि शामिल होगी।
वन मंत्री ने कहा कि कोविड काल के दौरान जंगलों में आग की घटनाएं काफी कम हुई थीं। इसके बाद कराए गए अध्ययन में यह सामने आया कि अधिकांश वनाग्नि की घटनाएं मानवजनित कारणों से होती हैं। इसी वजह से विभाग अब जनजागरूकता को सबसे प्रभावी उपाय मानते हुए बड़े स्तर पर अभियान चला रहा है। राज्यभर में अब तक 3500 से अधिक जागरूकता शिविर आयोजित किए जा चुके हैं, जिनमें ग्रामीणों और स्थानीय समुदायों को वनाग्नि रोकथाम के उपायों की जानकारी दी जा रही है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड का विषम भौगोलिक क्षेत्र वनाग्नि नियंत्रण में बड़ी चुनौती है। कई स्थानों पर वन विभाग की टीमों को घटनास्थल तक पहुंचने में समय लग जाता है। ऐसे में यदि स्थानीय लोग शुरुआती स्तर पर आग बुझाने में जुट जाएं तो बड़े नुकसान को रोका जा सकता है। इसी सोच के तहत गांवों को वन संरक्षण अभियान से जोड़ा जा रहा है।
वन विभाग के अनुसार जंगलों में आग पर नियंत्रण के लिए इस समय 11,650 कर्मी लगातार काम कर रहे हैं। इनमें 6025 विभागीय कर्मचारी और 5625 फायर वाचर शामिल हैं। इसके अतिरिक्त हर जिले में वरिष्ठ अधिकारियों को नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया है ताकि आपात स्थिति में त्वरित निर्णय और समन्वय सुनिश्चित हो सके। वन मंत्री ने जंगलों में आग फैलाने वाले सबसे बड़े कारण पिरुल यानी चीड़ की सूखी पत्तियों को लेकर भी महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने कहा कि अब पिरुल को स्थानीय लोगों की आजीविका से जोड़ा गया है। पहले पिरुल संग्रहण के लिए ग्रामीणों को दो रुपये प्रति किलोग्राम भुगतान किया जाता था, जिसे बढ़ाकर 10 रुपये प्रति किलोग्राम कर दिया गया है। इस वर्ष 8555 टन पिरुल संग्रहण का लक्ष्य रखा गया है। सरकार पिरुल से ब्रिकेट बनाने वाली इकाइयों की संख्या भी बढ़ाने जा रही है। वर्तमान में राज्य में नौ इकाइयां संचालित हैं। इसके अलावा पिरुल के अन्य व्यावसायिक उपयोगों को लेकर केंद्र सरकार से भी चर्चा जारी है।
वन मंत्री ने कहा कि राज्य की 11217 वन पंचायतों में जड़ी-बूटी और सगंध खेती को बढ़ावा देने के लिए 628 करोड़ रुपये का हर्बल मिशन भी संचालित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य वन संरक्षण के साथ ग्रामीणों की आय बढ़ाना है। वन विभाग को भारतीय वन सर्वेक्षण से लगातार फायर अलर्ट प्राप्त हो रहे हैं। इस वर्ष 15 फरवरी से 24 मई तक कुल 3769 अलर्ट मिले, जिनमें केवल 14 प्रतिशत अलर्ट ही वास्तविक जंगल की आग से जुड़े पाए गए। विभाग का दावा है कि पिछले वर्ष वनाग्नि की घटनाओं के मामले में उत्तराखंड देश में 14वें स्थान पर रहा था। एक अन्य सवाल के जवाब में वन मंत्री ने रुद्रनाथ ट्रेक को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि यात्राकाल के दौरान सीमित समय के लिए ही वहां आवाजाही की अनुमति दी जाती है और यात्रा अवधि समाप्त होने के बाद ट्रेक पर जाने की अनुमति नहीं होगी। वहीं पौड़ी वन प्रभाग में कर्मचारियों की कमी संबंधी सवाल पर उन्होंने कहा कि वर्तमान में वहां पर्याप्त कार्मिक उपलब्ध हैं। विभागीय पुनर्गठन को लेकर भी सरकार व्यावहारिक पहलुओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेगी।