उत्तराखंड

सीएम घोषणाओं में देरी पर सख्ती, अफसरों को समयसीमा में काम पूरा करने के निर्देश..

सीएम घोषणाओं में देरी पर सख्ती, अफसरों को समयसीमा में काम पूरा करने के निर्देश..

 

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में सीएम की घोषणाओं की प्रगति को लेकर इस बार हुई उच्चस्तरीय समीक्षा में कई अहम तथ्य सामने आए हैं। आमतौर पर इस तरह की बैठकों में योजनाओं की प्रगति पर चर्चा होती है, लेकिन इस बार फोकस उन परियोजनाओं पर भी रहा जो लंबे समय से लंबित हैं या विभिन्न कारणों से धरातल पर नहीं उतर पा रही हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए अब ऐसी योजनाओं को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू करने के संकेत भी दिए गए हैं। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में यह सामने आया कि सीएम की कई घोषणाओं के बावजूद संबंधित विभाग अपेक्षित गति से कार्य पूरा नहीं कर पा रहे हैं। इस पर नाराजगी जताते हुए स्पष्ट निर्देश दिए गए कि सभी विभाग अपनी-अपनी योजनाओं की स्थिति स्पष्ट करें। जिन योजनाओं को पूरा किया जाना संभव नहीं है, उनके विलोपन का प्रस्ताव तत्काल तैयार कर भेजा जाए।

बैठक में यह भी तय किया गया कि सीएम घोषणाओं के अंतर्गत शामिल योजनाओं को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रखा जाएगा। संबंधित विभागों को 15 दिनों की समयसीमा दी गई है, जिसके भीतर उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि कौन-सी परियोजनाएं व्यवहारिक हैं और किन्हें समाप्त करना जरूरी है। यदि निर्धारित समय के भीतर विलोपन का प्रस्ताव नहीं भेजा जाता है, तो यह माना जाएगा कि विभाग उन योजनाओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है और उस दिशा में तेजी से कार्य करना होगा। समीक्षा के दौरान यह भी सामने आया कि कई परियोजनाएं भूमि की अनुपलब्धता, विभागों के बीच समन्वय की कमी और प्रशासनिक अड़चनों के कारण अटकी हुई हैं। इस पर मुख्य सचिव ने निर्देश दिए कि जहां भूमि से जुड़ी समस्याएं हैं, वहां स्थानीय जनप्रतिनिधियों, विधायकों और जिला प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित कर जल्द समाधान निकाला जाए। यदि भूमि उपलब्ध कराई जा सकती है तो परियोजनाओं को तुरंत आगे बढ़ाया जाए, अन्यथा उनके विलोपन का प्रस्ताव तैयार किया जाए।

इसी प्रकार, अंतर-विभागीय समन्वय की कमी को भी कई योजनाओं के लंबित रहने का बड़ा कारण माना गया। विभागों को निर्देश दिए गए कि आपसी तालमेल बढ़ाकर समस्याओं का शीघ्र समाधान करें, ताकि परियोजनाओं पर समयबद्ध निर्णय लिया जा सके। बैठक में सीएम की 10-10 कार्य आधारित घोषणाओं की भी समीक्षा की गई और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने पर जोर दिया गया। लोक निर्माण विभाग से जुड़े कार्यों की समीक्षा के दौरान निर्देश दिए गए कि सड़क निर्माण और अन्य बुनियादी ढांचे से संबंधित जो कार्य संभव हैं, उनके लिए तत्काल शासनादेश जारी किए जाएं। वहीं जो परियोजनाएं किसी कारणवश संभव नहीं हैं, उन्हें बिना देरी विलोपन की प्रक्रिया में शामिल किया जाए। पेयजल योजनाओं को लेकर भी स्पष्ट समयसीमा तय की गई है, जिसमें अगले 20 दिनों के भीतर यह तय करना होगा कि कौन-सी योजनाएं क्रियान्वित की जा सकती हैं।

इसके साथ ही जिन परियोजनाओं के लिए साइट सिलेक्शन कमेटी की रिपोर्ट आवश्यक है, उन्हें शीघ्र उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए, ताकि अनावश्यक देरी से बचा जा सके। शिक्षा विभाग से जुड़े मामलों में केंद्रीय विद्यालयों की स्थापना के लिए भूमि उपलब्धता एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई। इस पर सुझाव दिया गया कि जहां सरकारी भूमि उपलब्ध नहीं है, वहां नियमों के तहत निजी या वन भूमि के विकल्पों पर भी विचार किया जाए। बैठक में गेस्ट हाउस निर्माण से जुड़े प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई। जिन जिलों में राज्य संपत्ति विभाग या लोक निर्माण विभाग के गेस्ट हाउस उपलब्ध नहीं हैं, वहां नए निर्माण के प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश दिए गए। इसके साथ ही कुछ परियोजनाएं केवल नामकरण तय न होने के कारण लंबित पाई गईं। ऐसे मामलों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर जल्द निर्णय लेने को कहा गया। स्पष्ट तौर पर सरकार अब सीएम घोषणाओं को लेकर गंभीर रुख अपनाते हुए या तो योजनाओं को तेजी से पूरा करने या फिर अव्यवहारिक योजनाओं को समाप्त करने की नीति पर आगे बढ़ रही है। इसका उद्देश्य न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना है, बल्कि संसाधनों और ऊर्जा का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना भी है, ताकि राज्य के विकास कार्यों को गति मिल सके।

 

 

 

 

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