उत्तराखंड

सड़क हादसों के घायलों तक नहीं पहुंच पा रही पीएम राहत योजना, केवल 7 मरीज हुए लाभान्वित..

सड़क हादसों के घायलों तक नहीं पहुंच पा रही पीएम राहत योजना, केवल 7 मरीज हुए लाभान्वित..

 

 

 

उत्तराखंड: सड़क दुर्घटनाओं में गंभीर रूप से घायल लोगों को त्वरित और निशुल्क उपचार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई प्रधानमंत्री सड़क दुर्घटना राहत योजना का उत्तराखंड में अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। योजना लागू होने के बावजूद बड़ी संख्या में घायल मरीज इसका फायदा लेने से वंचित हैं। आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष मार्च से जून के बीच राज्य में 406 लोग सड़क हादसों में घायल हुए, लेकिन इनमें से केवल सात घायलों को ही योजना के तहत मुफ्त उपचार मिल सका। केंद्र सरकार की ओर से फरवरी 2026 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य सड़क दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति को शुरुआती इलाज के लिए आर्थिक परेशानी से बचाना है। योजना के अनुसार सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को आयुष्मान भारत या योजना से संबद्ध नामित अस्पतालों में अधिकतम सात दिनों तक ₹1.50 लाख तक का निशुल्क इलाज उपलब्ध कराया जाता है। इसका मकसद दुर्घटना के बाद शुरुआती “गोल्डन ऑवर” के दौरान बेहतर चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करना है, ताकि अधिक से अधिक लोगों की जान बचाई जा सके।

योजना के प्रावधानों के अनुसार यदि दुर्घटना के समय घायल को किसी ऐसे अस्पताल में भर्ती कराया जाता है जो योजना से संबद्ध नहीं है, तो संबंधित अस्पताल पहले 48 घंटे तक मरीज को आवश्यक उपचार देकर उसकी स्थिति स्थिर करेगा। इसके बाद उसे योजना से जुड़े अधिकृत अस्पताल में रेफर किया जाएगा। इस पूरी प्रक्रिया में पुलिस की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि दुर्घटना की पुष्टि और आवश्यक दस्तावेजी कार्रवाई पुलिस के माध्यम से पूरी की जाती है। परिवहन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार मार्च से जून के बीच उत्तराखंड में कुल 514 सड़क दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। इन हादसों में 406 लोग घायल हुए, जबकि 281 लोगों की मौत हुई। इसके बावजूद पीएम राहत योजना के तहत केवल 17 मामलों की प्रक्रिया शुरू हो सकी।

जांच के दौरान सामने आया कि इन 17 मामलों में भी सभी लाभार्थियों को योजना का फायदा नहीं मिल पाया। सात मामलों में पुलिस स्तर पर आवश्यक औपचारिकताएं समय पर पूरी नहीं हो सकीं, जिसके कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी। वहीं तीन मामलों में घायल व्यक्ति योजना की पात्रता की श्रेणी में नहीं आ सके। अंततः केवल सात घायलों का ही ऊधम सिंह नगर, देहरादून और चमोली जिले के नामित अस्पतालों में इस योजना के तहत निशुल्क उपचार किया गया।विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क दुर्घटना के मामलों में समय पर इलाज जीवन बचाने की सबसे बड़ी कुंजी होता है। ऐसे में यदि योजना की प्रक्रिया सरल और तेज बनाई जाए तथा पुलिस, अस्पतालों और संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हो, तो अधिक संख्या में घायल मरीजों को इसका लाभ मिल सकता है।

राज्य सरकार और परिवहन विभाग भी योजना के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सक्रियता दिखा रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार जल्द ही पुलिस और परिवहन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों की संयुक्त बैठक आयोजित की जाएगी। बैठक में योजना के संचालन के दौरान सामने आ रही व्यावहारिक समस्याओं की समीक्षा की जाएगी और उन कमियों को दूर करने के उपायों पर चर्चा होगी, जिनकी वजह से पात्र घायल योजना का लाभ नहीं ले पा रहे हैं।अधिकारियों का कहना है कि भविष्य में यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाएगा कि सड़क दुर्घटना में घायल प्रत्येक पात्र व्यक्ति को समय पर योजना का लाभ मिले और इलाज में किसी प्रकार की प्रशासनिक या तकनीकी बाधा न आए। इसके लिए अस्पतालों, पुलिस और संबंधित विभागों के बीच समन्वय को और मजबूत करने के साथ-साथ योजना के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। सड़क सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि दुर्घटनाओं में घायल लोगों के लिए ऐसी योजनाएं तभी प्रभावी साबित होंगी, जब उनकी प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और त्वरित हो। समय पर उपचार मिलने से न केवल गंभीर मरीजों की जान बचाई जा सकती है, बल्कि दुर्घटना के बाद परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है।

 

 

 

 

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