उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों पर संकट, पांच हजार में 10 या उससे कम छात्र..
उत्तराखंड: उत्तराखंड में सरकारी स्कूलों की घटती छात्र संख्या शिक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। प्रदेश में नए प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल खोलने की रफ्तार भले ही थमी हुई हो, लेकिन पहले से संचालित विद्यालयों में भी विद्यार्थियों की संख्या लगातार कम हो रही है। स्थिति यह है कि राज्य के करीब पांच हजार सरकारी प्राथमिक और जूनियर हाईस्कूल ऐसे हैं, जहां छात्र-छात्राओं की संख्या 10 या उससे भी कम रह गई है। सबसे चिंताजनक स्थिति प्राथमिक विद्यालयों की है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश के 4,275 सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में छात्र संख्या 10 या उससे कम रह गई है। इनमें कई स्कूल ऐसे भी हैं, जहां पढ़ने वाले बच्चों की संख्या महज एक, तीन या चार तक सिमट गई है। वहीं, सरकारी जूनियर हाईस्कूलों में भी करीब 650 विद्यालय ऐसे हैं, जहां 10 या उससे कम विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। यह स्थिति उस समय सामने आ रही है जब सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की ओर से कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। विद्यालयी शिक्षा पर हर वर्ष हजारों करोड़ रुपये का बजट खर्च होने के बावजूद बड़ी संख्या में स्कूलों का कम छात्र संख्या से जूझना विभाग के सामने गंभीर चुनौती खड़ी करता है। सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति को अलग-अलग छात्र संख्या के आधार पर देखें तो तस्वीर और स्पष्ट होती है। प्रदेश में 2,940 प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां विद्यार्थियों की संख्या 20 या उससे कम है। इसके अलावा 1,327 विद्यालयों में छात्र संख्या 30 या उससे कम रह गई है।
वहीं, 1,062 प्राथमिक विद्यालय ऐसे हैं जहां बच्चों की संख्या 50 या उससे कम है। इन आंकड़ों से साफ है कि बड़ी संख्या में सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या उस स्तर तक पहुंच चुकी है, जहां विद्यालयों के संचालन और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। कम छात्र संख्या वाले कई विद्यालयों में एक ही शिक्षक पर कई कक्षाओं की जिम्मेदारी होने की स्थिति भी सामने आती है। इससे शिक्षकों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और बच्चों को उनकी जरूरत के मुताबिक शैक्षणिक माहौल उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
योजनाएं कई, लेकिन स्कूलों में नहीं बढ़ रहे बच्चे
सरकारी विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए केंद्र तथा राज्य सरकार की ओर से कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इनमें समग्र शिक्षा अभियान, प्रधानमंत्री पोषण योजना, मुख्यमंत्री मेधावी छात्र प्रोत्साहन छात्रवृत्ति योजना और बालिका शिक्षा प्रोत्साहन योजना जैसी योजनाएं शामिल हैं। इसके साथ ही अटल उत्कृष्ट विद्यालय, पीएम श्री स्कूल और क्लस्टर विद्यालय जैसी अवधारणाओं के माध्यम से भी सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के प्रयास किए गए हैं। इसके बावजूद कई सरकारी विद्यालयों में बच्चों की संख्या लगातार कम होना चिंता का विषय बना हुआ है।सरकारी विद्यालयों में घटती छात्र संख्या के पीछे एक नहीं बल्कि कई कारण बताए जाते हैं। ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन इसका एक बड़ा कारण है। परिवारों के गांव से शहरों की ओर जाने के साथ बच्चों की संख्या भी कम होती जा रही है। इसके अलावा कई स्थानों पर स्कूल भवनों की स्थिति खराब होना, पर्याप्त बुनियादी सुविधाओं का अभाव, शिक्षकों की कमी और विद्यालयों में उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल नहीं होना भी विद्यार्थियों को सरकारी स्कूलों से दूर करने वाले कारणों में शामिल हैं। शिक्षकों की गैर-शैक्षणिक कार्यों में ड्यूटी लगने का असर भी पढ़ाई पर पड़ता है। इससे शिक्षकों को नियमित शिक्षण कार्य के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। दूसरी ओर, अभिभावकों का निजी स्कूलों की ओर बढ़ता रुझान भी सरकारी स्कूलों में नामांकन घटने की एक वजह माना जा रहा है।
आरटीई और निजी स्कूलों का भी असर
शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत निजी विद्यालयों में आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए 25 प्रतिशत सीटों पर प्रवेश का प्रावधान भी सरकारी स्कूलों की छात्र संख्या पर प्रभाव डालने वाले कारकों में गिना जाता है। इसके अलावा अभिभावकों के बीच निजी स्कूलों को लेकर बढ़ती पसंद के कारण भी सरकारी विद्यालयों में दाखिला प्रभावित हो रहा है।विशेषकर ऐसे क्षेत्रों में जहां सरकारी और निजी विद्यालय दोनों उपलब्ध हैं, वहां अभिभावक सुविधाओं, अंग्रेजी माध्यम, परिवहन और अन्य व्यवस्थाओं को देखते हुए निजी विद्यालयों का विकल्प चुन रहे हैं।
12 हजार करोड़ के करीब शिक्षा बजट, फिर भी चुनौती बरकरार
उत्तराखंड में विद्यालयी शिक्षा के लिए हर वर्ष करीब 12 हजार करोड़ रुपये का बजट रखा जाता है। केंद्र और राज्य की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सरकारी स्कूलों में आधारभूत सुविधाएं, पोषण, छात्रवृत्ति, शिक्षण व्यवस्था और स्कूलों के विकास पर खर्च किया जा रहा है। इसके बावजूद हजारों विद्यालयों में छात्र संख्या का बेहद कम रह जाना शिक्षा विभाग की नीतियों और उनके जमीनी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करता है। सवाल यह भी है कि जिन विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार घट रही है, वहां उपलब्ध मानव संसाधन और बजट का अधिक प्रभावी इस्तेमाल कैसे किया जाए। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में यह समस्या और गंभीर रूप ले रही है। छोटे गांवों से लगातार हो रहे पलायन के कारण कई गांवों में बच्चों की संख्या बेहद कम हो गई है। ऐसे में वहां स्कूल तो मौजूद हैं, लेकिन पढ़ने वाले विद्यार्थी गिने-चुने रह गए हैं।कई विद्यालयों में छात्र संख्या इतनी कम है कि एक पूरी कक्षा में भी पर्याप्त विद्यार्थी नहीं मिलते। इसके बावजूद विद्यालय भवन, शिक्षक और अन्य संसाधनों को बनाए रखने का खर्च जारी रहता है। ऐसे स्कूलों के लिए सरकार के सामने एक ओर शिक्षा की पहुंच बनाए रखने की चुनौती है तो दूसरी ओर सीमित संसाधनों का बेहतर उपयोग करने की जरूरत भी है।
सरकारी स्कूलों को फिर आकर्षण का केंद्र बनाने की जरूरत
घटती छात्र संख्या के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी स्कूलों को दोबारा अभिभावकों और बच्चों की पहली पसंद कैसे बनाया जाए। इसके लिए केवल नई योजनाओं की घोषणा के बजाय स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करना, पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध कराना, शिक्षण की गुणवत्ता सुधारना और स्थानीय जरूरतों के अनुसार स्कूलों का विकास करना जरूरी माना जा रहा है। अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों की संख्या आने वाले वर्षों में और बढ़ सकती है। खासकर पर्वतीय क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों को बचाए रखना केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि गांवों की सामाजिक संरचना और वहां की आबादी को बनाए रखने से भी जुड़ा विषय है। ऐसे में सरकार और शिक्षा विभाग के सामने चुनौती सिर्फ विद्यार्थियों का नामांकन बढ़ाने की नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों में ऐसा भरोसेमंद और गुणवत्तापूर्ण वातावरण तैयार करने की है, जिससे अभिभावक अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में पढ़ाने के लिए दोबारा प्रेरित हों।