शहतूत की V-1 वैरायटी से बढ़ेगा रेशम उत्पादन, किसानों को मिलेगा ज्यादा मुनाफा..
उत्तराखंड: उत्तराखंड में रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए रेशम विभाग ने एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। पहली बार राज्य में शहतूत की हाई-यील्ड V-1 प्रजाति के पौधों का रोपण किया जाएगा। विभाग का मानना है कि इस उन्नत किस्म के माध्यम से रेशम उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, जिससे किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी विकसित होंगे। राज्य में अब तक रेशम की खेती के लिए मुख्य रूप से शहतूत की S-146 प्रजाति का उपयोग किया जाता रहा है। हालांकि, अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए रेशम विभाग ने नई रणनीति के तहत महाराष्ट्र के अकोला और अमरावती से V-1 प्रजाति के पौधे मंगाए हैं। यह प्रजाति देश के कई राज्यों में बेहतर परिणाम देने के कारण पहले से ही किसानों के बीच लोकप्रिय मानी जाती है। विभाग के अनुसार 15 जुलाई को हरेला पर्व के अवसर पर चयनित सरकारी रेशम उद्यानों में V-1 प्रजाति के पौधों का रोपण अभियान शुरू किया जाएगा। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से इन पौधों को किसानों के खेतों तक भी पहुंचाया जाएगा। वर्ष 2026-27 के लिए विभाग ने सरकारी फार्मों और किसानों की भूमि पर कुल 2 लाख 80 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके साथ ही इस वर्ष 99 हजार 100 किलोग्राम कोया (कोकून) उत्पादन का लक्ष्य भी तय किया गया है।
V-1 प्रजाति क्यों है खास?
रेशम विशेषज्ञों के अनुसार V-1 प्रजाति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अधिक पत्ती उत्पादन क्षमता और बेहतर पोषण गुणवत्ता है। रेशम के कीड़ों का मुख्य भोजन शहतूत की पत्तियां होती हैं। यदि पत्तियां अधिक पौष्टिक और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों तो कीड़ों का विकास तेजी से होता है, जिससे उच्च गुणवत्ता वाले कोकून तैयार होते हैं। बेहतर कोकून से अधिक और उत्कृष्ट गुणवत्ता का रेशम प्राप्त होता है, जिसका सीधा लाभ किसानों को मिलता है। विशेषज्ञों का कहना है कि V-1 प्रजाति की पत्तियां लंबे समय तक हरी और पौष्टिक बनी रहती हैं। इससे एक ही क्षेत्र में पहले की तुलना में अधिक बार पत्ती उत्पादन संभव हो सकेगा। यही कारण है कि यह प्रजाति रेशम उत्पादन की लागत कम करने और उत्पादन बढ़ाने में प्रभावी मानी जा रही है।
किसानों की आय बढ़ाने पर रहेगा फोकस
रेशम विभाग का मानना है कि नई प्रजाति अपनाने से किसानों की उत्पादन लागत और आय के बीच बेहतर संतुलन बनेगा। अधिक कोकून उत्पादन होने से किसानों को बाजार में बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी। इससे रेशम पालन को आजीविका के एक मजबूत विकल्प के रूप में विकसित किया जा सकेगा। विभाग का उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रदेश में रेशम आधारित अर्थव्यवस्था को मजबूत करना भी है। इसके लिए किसानों को उन्नत पौध, तकनीकी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की योजना भी तैयार की जा रही है, ताकि नई तकनीक का अधिकतम लाभ उन्हें मिल सके।
ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ेंगे रोजगार के अवसर
रेशम उत्पादन एक श्रम आधारित गतिविधि है, जिसमें पौधरोपण, पत्ती उत्पादन, रेशम के कीड़ों का पालन, कोकून तैयार करना और उससे जुड़े अन्य कार्यों में बड़ी संख्या में लोगों की भागीदारी होती है। ऐसे में V-1 प्रजाति के विस्तार से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार और रोजगार के नए अवसर सृजित होने की उम्मीद है। विशेष रूप से महिलाओं और युवाओं को इस क्षेत्र से जोड़ने पर विभाग का विशेष जोर रहेगा। रेशम विभाग के अधिकारियों का कहना है कि यदि V-1 प्रजाति का पहला चरण सफल रहता है तो आने वाले वर्षों में इसे पूरे उत्तराखंड में व्यापक स्तर पर लागू किया जाएगा। इसके माध्यम से प्रदेश को रेशम उत्पादन के क्षेत्र में नई पहचान दिलाने के साथ-साथ किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया जाएगा। विभाग का विश्वास है कि आधुनिक तकनीक, उन्नत पौधों और वैज्ञानिक तरीके से रेशम उत्पादन को बढ़ावा देकर उत्तराखंड में इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया जा सकता है। इससे कृषि के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी और रेशम उद्योग के विकास को नई गति मिलेगी।