उत्तराखंड

15 साल बाद निकली देवरा यात्रा में अवरोध, देव डोली के लौटने से श्रद्धालु और प्रशासन हुए हैरान..

15 साल बाद निकली देवरा यात्रा में अवरोध, देव डोली के लौटने से श्रद्धालु और प्रशासन हुए हैरान..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड केवल एक भौगोलिक राज्य नहीं, बल्कि आस्था, तपस्या और दिव्यता की जीवंत पहचान है। इस देवभूमि की मिट्टी में ऋषियों की साधना, पर्वतों में देवताओं का वास और नदियों की धाराओं में सदियों पुरानी आस्थाओं की गूंज समाई हुई है। यहां का हर मार्ग किसी तीर्थ की ओर जाता है और हर शिला किसी पौराणिक कथा की साक्षी रही है। लेकिन बदलते समय के साथ प्रश्न यह उठने लगे हैं कि क्या हम इस पवित्र विरासत की मर्यादा को भूलते जा रहे हैं? क्या विकास के नाम पर किए जा रहे निर्माण और आधुनिक संरचनाएं हमारी धार्मिक भावनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों पर भारी पड़ रही हैं? जब आस्था के मार्ग अवरोधों में बदलने लगें और देव परंपराएं व्यवस्था की भेंट चढ़ने लगें, तब यह केवल एक घटना नहीं रह जाती, बल्कि पूरे समाज के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाती है। रुद्रप्रयाग जिले के अगस्त्यमुनि में मकर संक्रांति के पावन अवसर पर हुई घटना ने यह सवाल और भी गूढ़ तरीके से सामने रख दिया। 15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद निकली अगस्त्य ऋषि मुनि महाराज की देव डोली मार्ग में अटक गई, जिससे न केवल श्रद्धालु प्रभावित हुए, बल्कि स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के लिए भी यह एक चेतावनी बनकर सामने आई यह घटना सिर्फ एक जाम या मार्ग अवरोध तक सीमित नहीं थी।

यह हमारी संस्कृति और परंपरा के महत्व, आस्था की पवित्रता और देवभूमि में विकास और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन की याद दिलाने वाली चेतावनी थी। उत्तराखंड में हर पर्वत, हर घाटी और हर मंदिर हमें यह संदेश देते हैं कि हमारी आस्था, हमारी परंपरा, और हमारी भूमि तीनों ही अमूल्य हैं। लेकिन अगर इन्हें नजरअंदाज किया गया तो हमारी अगली पीढ़ी केवल मीलों दूर स्थित पर्यटन स्थल या आधुनिक संरचनाओं के दृश्य देख पाएगी, न कि अपनी विरासत के जीवंत अनुभव को। इसलिए, अगस्त्यमुनि में हुई यह घटना हमें यह याद दिलाती है कि विकास और आधुनिकता आवश्यक है, लेकिन वह तभी सार्थक होगा जब हम अपनी आस्था, परंपरा और प्राकृतिक विरासत का सम्मान करना न भूलें।

आपको बता दे कि 14 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर अगस्त्य ऋषि मुनि महाराज की चल विग्रह देव डोली लगभग 15 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद क्षेत्र भ्रमण के लिए निकाली गई। इस ऐतिहासिक अवसर पर अगस्त्यमुनि और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर पहुंचे। जैसे ही देव डोली मंदिर से बाहर निकली, पूरा क्षेत्र “मुनि महाराज की जय” के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालुओं में अपार उत्साह था। हर कोई इस दुर्लभ पल का साक्षी बनना चाहता था और देवता के दर्शन कर आशीर्वाद लेना चाहता था।

जब विकास बना आस्था की राह में बाधा..

देव डोली जैसे ही अगस्त्य ऋषि सैण (मुख्य बाजार क्षेत्र) की ओर बढ़ी, तभी यात्रा में अप्रत्याशित व्यवधान आ गया। स्टेडियम के पास बने भारी-भरकम गेट के कारण देव डोली आगे नहीं बढ़ सकी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे देव अप्रसन्नता के संकेत के रूप में देखा गया। डोली को आगे बढ़ाने के लिए पुजारियों, स्थानीय बुजुर्गों और श्रद्धालुओं ने घंटों तक प्रयास किए, पूजा-अर्चना की गई, लेकिन डोली वहीं ठहर गई। श्रद्धालुओं के बीच यह चर्चा तेज हो गई कि अगस्त्य ऋषि मुनि महाराज अपने तपस्थल की बदहाल स्थिति और अव्यवस्थित निर्माण से नाराज हैं। देव डोली के रुकते ही स्थिति और गंभीर हो गई। केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर दोनों ओर से यातायात पूरी तरह ठप हो गया। करीब तीन से चार किलोमीटर लंबा जाम लग गया।

तीर्थयात्री, स्थानीय लोग और राहगीर घंटों तक सड़क पर फंसे रहे। हालात ऐसे बन गए कि प्रशासन को भी समझ नहीं आया कि स्थिति को कैसे संभाला जाए। लंबे इंतजार और असफल प्रयासों के बाद अंततः देव डोली मंदिर परिसर की ओर वापस लौट गई। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल प्रशासनिक तैयारियों पर सवाल खड़े किए, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या आधुनिक निर्माण और विकास कार्यों में धार्मिक आस्थाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है? स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस मैदान को अगस्त्य ऋषि मुनि महाराज की तपोभूमि माना जाता है, वहां स्टेडियम और अन्य संरचनाएं बनाकर उसकी पवित्रता को नुकसान पहुंचाया गया है। आज उसी का परिणाम सामने आया। घंटों तक लगे जाम और देव डोली के लौटने की घटना ने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और प्रशासन को आईना दिखा दिया है। श्रद्धालुओं को उम्मीद है कि इस घटना के बाद जिम्मेदार लोग आस्था, परंपरा और विकास के बीच संतुलन बनाने की दिशा में गंभीरता से सोचेंगे।देवभूमि में देवों की नाराजगी को नजरअंदाज करना शायद किसी के हित में नहीं है।

 

 

 

 

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