उत्तराखंड

योगनगरी में एमए और पीजी डिप्लोमा में खाली सीटें, कॉलेज प्रशासन परेशान..

योगनगरी में एमए और पीजी डिप्लोमा में खाली सीटें, कॉलेज प्रशासन परेशान..

 

 

 

उत्तराखंड: योगनगरी हरिद्वार में देश-दुनिया से लोग योग सीखने पहुंचते हैं, लेकिन इसके बावजूद श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के पं. ललित मोहन शर्मा परिसर में चल रहे योग व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की सीटें खाली हैं। यह स्थिति वर्षों से बनी हुई है, जिससे योग शिक्षा के प्रचार-प्रसार में अपेक्षित गति नहीं आ पा रही है। सूत्रों के अनुसार वर्ष 2003 में पं. ललित मोहन शर्मा परिसर में योग पाठ्यक्रम पीजी डिप्लोमा के साथ शुरू किया गया था। उस समय यह कॉलेज हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय से संबद्ध था। वर्ष 2008 में गढ़वाल विवि ने एमए योग पाठ्यक्रम को भी मान्यता दी, जिसके बाद इस परिसर में पीजी डिप्लोमा के साथ एमए पाठ्यक्रम भी संचालित होने लगा। हालांकि विवि ने इन दोनों पाठ्यक्रमों को स्ववित्त पोषित पाठ्यक्रम की श्रेणी में रखा था। इसका अर्थ यह हुआ कि इन पाठ्यक्रमों में नामांकन शुल्क काफी अधिक होने के कारण आम छात्रों की पहुंच सीमित रही। वर्ष 2019 में कॉलेज को श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय का परिसर बना दिया गया, लेकिन इसके बावजूद पाठ्यक्रमों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया। नतीजतन, आज भी यहां योग के व्यावसायिक पाठ्यक्रम पूरी तरह से सक्रिय होने के बावजूद सीटें खाली पड़ी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन पाठ्यक्रमों की फीस संरचना में संशोधन और प्रचार-प्रसार के प्रयास किए जाएं तो हरिद्वार को योग शिक्षा का एक वास्तविक केंद्र बनाया जा सकता है। इसके अलावा, यह न केवल छात्रों के लिए अवसर बढ़ाएगा बल्कि अंतरराष्ट्रीय योग पर्यटन को भी बढ़ावा देगा।

वर्तमान में एमए योग में 60 और पीजी डिप्लोमा में 40 सीटें हैं, लेकिन हालात चिंताजनक बने हुए हैं। सूत्रों के अनुसार एमए योग के प्रथम सेमेस्टर में 10 सीटें खाली हैं, जबकि पीजी डिप्लोमा में मात्र 5 छात्रों का नामांकन हुआ है। इसका मतलब है कि कुल 35 सीटें अभी भी खाली पड़ी हैं। इस स्थिति ने कॉलेज प्रशासन के लिए इन सीटों को भर पाना मुश्किल बना दिया है। कॉलेज प्रशासन ने कहा कि क्षेत्र में योग सीखने के इच्छुक छात्रों की संख्या बहुत कम है। इस वजह से पाठ्यक्रमों की स्थिरता और संचालन पर असर पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर स्थिति ऐसे ही रही, तो छात्रों को पीएचडी या उच्च शिक्षा के लिए अन्य विश्वविद्यालयों का रुख करना पड़ेगा, जिससे परिसर का योग केंद्र वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं कर पाएगा। विशेषज्ञों और शिक्षकों का मानना है कि यदि पाठ्यक्रमों का प्रचार-प्रसार बढ़ाया जाए और छात्रवृत्ति या फीस में कुछ सुधार किया जाए, तो योग शिक्षा में रुचि रखने वाले छात्रों को आकर्षित किया जा सकता है और खाली सीटों की समस्या हल की जा सकती है।

 

 

 

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