उत्तराखंड

भारत पर्व में उत्तराखंड की झांकी ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ के थीम पर तैयार..

भारत पर्व में उत्तराखंड की झांकी ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ के थीम पर तैयार..

 

 

 

उत्तराखंड: भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और राष्ट्रीय गौरव को प्रदर्शित करने वाले भारत पर्व 2026 में इस साल उत्तराखंड अपनी विशेष झांकी के माध्यम से आत्मनिर्भरता की कहानी प्रस्तुत करेगा। रक्षा मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय रंगशाला शिविर, नई दिल्ली में आयोजित प्रेसवार्ता में यह जानकारी दी गई। इस अवसर पर कहा गया कि उत्तराखंड की झांकी इस वर्ष ‘आत्मनिर्भर उत्तराखंड’ थीम पर आधारित होगी और राज्य की विभिन्न सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक उपलब्धियों को दर्शाएगी। प्रेसवार्ता में अधिकारियों ने कहा कि झांकी में उत्तराखंड के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण, स्वरोजगार, पर्यटन और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में राज्य की प्रगति को प्रमुख रूप से दिखाया जाएगा।

यह झांकी न केवल राज्य की सांस्कृतिक विरासत को प्रदर्शित करेगी, बल्कि यह संदेश भी देगी कि उत्तराखंड आत्मनिर्भरता और विकास के मार्ग पर अग्रसर है। विशेष रूप से तैयार की गई झांकी में राज्य की लोककला, पारंपरिक व्यवसाय और सामाजिक उपलब्धियों को शामिल किया गया है। अधिकारियों का कहना है कि यह झांकी पूरे देश में उत्तराखंड की पहचान को मजबूत करेगी और लोगों को राज्य की विविधताओं और उपलब्धियों के प्रति जागरूक करेगी। इस आयोजन में भाग लेने वाले राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों के साथ उत्तराखंड की झांकी भी राष्ट्रीय मंच पर अपनी विशिष्टता और प्रगति की कहानी प्रस्तुत करेगी।

 

उत्तराखंड की झांकी में क्या है खास ?
सूचना विभाग के संयुक्त निदेशक एवं झांकी के नोडल अधिकारी के.एस. चौहान ने बताया कि झांकी के ट्रैक्टर सेक्शन में उत्तराखंड के पारंपरिक वाद्ययंत्र ढोल और रणसिंघा की तांबे से निर्मित आकर्षक प्रतिकृतियां प्रदर्शित की गई हैं। ये प्रतिकृतियां राज्य की सांस्कृतिक समृद्धि और शिल्पी कारीगरों की उत्कृष्ट कलात्मक दक्षता का प्रतीक हैं।

झांकी के ट्रेलर सेक्शन के प्रथम भाग में तांबे के मंजीरे की एक विशाल और प्रभावशाली मूर्ति दर्शायी गई है, जो तांबे की पारंपरिक कला की बारीकियों को दर्शाती है। मध्य भाग में उत्तराखंड के पारंपरिक घरेलू जीवन में उपयोग होने वाले तांबे के बर्तन जैसे गागर, सुरही और कुंडी को खूबसूरती से सजाया गया है। इसके साथ ही साइड पैनल में पारंपरिक वाद्ययंत्र भोंकोर के चित्रण झांकी की सांस्कृतिक कथा को और सशक्त बनाते हैं।

झांकी के अंतिम हिस्से में तांबे के कारीगर की एक सजीव और प्रभावशाली मूर्ति स्थापित की गई है, जिसमें वह हाथ से तांबे के बर्तन बनाते हुए दिखाया गया है। आसपास रखे गए तांबे के बर्तन पीढ़ियों से चले आ रहे ज्ञान, कौशल और श्रम की गरिमा को दर्शाते हैं। बहन कब चलेंगे हम मेरे से तो बैठा भी नही जा रहा है।

सदियों से ये शिल्प उत्पाद हैं उत्तराखंड की पहचान..

के.एस. चौहान ने कहा कि झांकी में तांबे के पारंपरिक बर्तन और उपकरण भी शामिल होंगे, जो न केवल उत्कृष्ट शिल्प कौशल का उदाहरण हैं, बल्कि उत्तराखंड के सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का भी अभिन्न हिस्सा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह शिल्प उत्पाद सदियों से राज्य की पहचान और रचनात्मक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं।

चौहान ने आगे कहा कि शिल्पी समुदाय के कई परिवार आज भी इस प्राचीन शिल्प परंपरा को अपनी आजीविका का मुख्य स्रोत मानते हैं। इस झांकी के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश भी जाएगा कि उत्तराखंड की आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं में भी मजबूत है। प्रदर्शित झांकी राज्य की पारंपरिक कला, महिला सशक्तिकरण और स्वरोजगार से जुड़े पहलुओं को भी उजागर करेगी, जिससे यह न केवल राष्ट्रीय मंच पर उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता को प्रदर्शित करेगी, बल्कि राज्य की आत्मनिर्भरता और रचनात्मक शक्ति का प्रतीक भी बनेगी।

 

 

 

 

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