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मानव-वन्यजीव संघर्ष पर लगाम की तैयारी, उत्तराखंड में बनेंगे 10 ट्रांजिट सेंटर..

मानव-वन्यजीव संघर्ष पर लगाम की तैयारी, उत्तराखंड में बनेंगे 10 ट्रांजिट सेंटर..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में लगातार बढ़ रही मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को देखते हुए वन विभाग ने महत्वपूर्ण कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। राज्यभर में 10 नए ट्रांजिट सेंटर स्थापित करने की योजना बनाई गई है, जहां रेस्क्यू किए गए वन्यजीवों को अस्थायी रूप से सुरक्षित रखा जा सकेगा। इस पहल का उद्देश्य मानव बस्तियों में पहुंचने वाले वन्यजीवों को नियंत्रित करने के साथ-साथ लोगों और जानवरों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। वन विभाग के अनुसार प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के दौरान तेंदुए, भालू और अन्य वन्यजीवों के मानव आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने की घटनाओं में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। विशेष रूप से पर्वतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में वन्यजीवों के हमलों से लोगों में भय का माहौल बना हुआ है। ऐसी परिस्थितियों में वन्यजीवों को सुरक्षित तरीके से पकड़कर रखने और उनके पुनर्वास की व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक हो गया है।

प्रस्तावित ट्रांजिट सेंटरों में तेंदुओं के साथ-साथ भालुओं को रखने के लिए भी विशेष बाड़ों का निर्माण किया जाएगा। वन विभाग का मानना है कि वर्तमान में भालुओं के लिए पर्याप्त रेस्क्यू और अस्थायी आवास सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं, जिससे कई बार रेस्क्यू अभियान चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं। नई व्यवस्था के तहत घायल, बीमार अथवा आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने वाले भालुओं को सुरक्षित रखा जा सकेगा। आंकड़ों के अनुसार बीते एक वर्ष में प्रदेश में भालुओं के हमलों की 116 घटनाएं सामने आई हैं। इन घटनाओं में आठ लोगों की जान चली गई, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए। यह आंकड़े राज्य में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीरता को दर्शाते हैं। वन विभाग का कहना है कि नए ट्रांजिट सेंटर बनने से ऐसे मामलों में त्वरित कार्रवाई करने में मदद मिलेगी और वन्यजीवों को सुरक्षित तरीके से नियंत्रित किया जा सकेगा।

वर्तमान समय में राज्य में वन्यजीवों के लिए केवल हरिद्वार के चिड़ियापुर क्षेत्र में एक ट्रांजिट सेंटर संचालित है। प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से रेस्क्यू किए गए वन्यजीवों को यहां तक पहुंचाना कई बार समय लेने वाला और चुनौतीपूर्ण कार्य साबित होता है। इसी कारण अलग-अलग क्षेत्रों में नए ट्रांजिट सेंटर स्थापित करने की योजना तैयार की गई है, जिससे रेस्क्यू कार्यों की दक्षता बढ़ सके। वन विभाग की योजना के अनुसार प्रस्तावित ट्रांजिट सेंटरों में करीब 80 तेंदुओं को रखने की क्षमता विकसित की जाएगी। इसके अलावा अन्य वन्यजीवों के लिए भी आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। इन केंद्रों में पशु चिकित्सकीय देखभाल, निगरानी, उपचार और पुनर्वास से जुड़ी व्यवस्थाएं भी विकसित की जाएंगी।

अपर प्रमुख वन संरक्षक विवेक पांडे ने बताया कि योजना को स्वीकृति मिलने के बाद इसके डिजाइन और तकनीकी मानकों को केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की मंजूरी के लिए भेजा गया है। स्वीकृति मिलने के बाद निर्माण प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने कहा कि वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए यह परियोजना महत्वपूर्ण साबित होगी। वहीं अल्मोड़ा स्थित मिनी चिड़ियाघर और रेस्क्यू सेंटर को अलग-अलग विकसित करने की भी योजना बनाई जा रही है। इससे रेस्क्यू किए गए वन्यजीवों की देखभाल और पुनर्वास कार्यों को अधिक व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जा सकेगा। विभागीय अधिकारियों के अनुसार अल्मोड़ा रेस्क्यू सेंटर की क्षमता बढ़ाने पर भी विचार किया जा रहा है ताकि भविष्य में बढ़ती जरूरतों को पूरा किया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तराखंड जैसे वन संपदा से समृद्ध राज्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में आधुनिक सुविधाओं से लैस ट्रांजिट सेंटर न केवल वन्यजीव संरक्षण को मजबूती देंगे, बल्कि स्थानीय लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। वन विभाग की यह पहल आने वाले समय में राज्य में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते टकराव को कम करने की दिशा में एक अहम कदम साबित हो सकती है।

 

 

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