पौड़ी की पहल बनी प्रेरणा, अब पूरे राज्य में लागू होगा जनभागीदारी मॉडल..
उत्तराखंड: उत्तराखंड में वन पंचायतों को सशक्त बनाकर वनों को फिर से हरा-भरा करने और सूखते जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने की दिशा में अब जनसहभागिता आधारित मॉडल को प्राथमिकता दी जा रही है। इस पहल की प्रेरणा गढ़वाल मंडल के पौड़ी गढ़वाल जिले की उन वन पंचायतों से ली जा रही है, जिन्होंने सामूहिक प्रयासों से पर्यावरण संरक्षण की एक नई मिसाल कायम की है। वन पंचायत विभाग अब इन सफल प्रयोगों को राज्यभर में लागू करने की तैयारी में है, ताकि सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से हजारों वन पंचायतों की तस्वीर बदली जा सके। पौड़ी जिले की करीब छह वन पंचायतों ने जल संरक्षण, वन संवर्धन और जनजागरूकता के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। इन पंचायतों में ग्रामीणों ने केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर रहने के बजाय स्वयं आगे बढ़कर श्रमदान, पौधारोपण और प्राकृतिक जल स्रोतों की रक्षा का संकल्प लिया। परिणामस्वरूप, जो जल स्रोत वर्षों पहले सूख चुके थे, वे अब दोबारा बहने लगे हैं। गांवों के आसपास घटता वन क्षेत्र धीरे-धीरे घने जंगल में तब्दील हो गया है। इसका सकारात्मक असर पर्यावरण संतुलन के साथ-साथ ग्रामीणों की आजीविका, पशुपालन और कृषि गतिविधियों पर भी पड़ा है।
नैनी डांडा रेंज बना बदलाव का केंद्र..
इन प्रयासों का प्रमुख केंद्र नैनी डांडा रेंज की वन पंचायतें रही हैं, जहां वर्ष 2012 से सुनियोजित तरीके से वन संरक्षण अभियान शुरू किया गया। पंचायत स्तर पर समितियां गठित की गईं, चराई पर नियंत्रण के नियम तय किए गए और अवैध कटान पर सख्ती बरती गई। करीब 10 हेक्टेयर क्षेत्र में घना वन विकसित किया गया। पेड़ों की संख्या बढ़ने से वर्षा जल का बेहतर संचयन हुआ, जिससे भूजल स्तर में सुधार आया और कई प्राकृतिक जल स्रोत पुनर्जीवित हो गए। यह परिवर्तन दर्शाता है कि स्थानीय समुदाय यदि जिम्मेदारी ले तो पर्यावरण संरक्षण के ठोस परिणाम सामने आ सकते हैं। उत्तराखंड में जल, जंगल और जमीन से महिलाओं का ऐतिहासिक जुड़ाव रहा है। पौड़ी की वन पंचायतों की सफलता में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी निर्णायक साबित हुई। ग्रामीण महिलाओं ने पौधारोपण से लेकर पौधों की देखभाल, निगरानी और जल स्रोतों की सुरक्षा तक हर स्तर पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाई। उन्होंने न केवल नई पौध तैयार की, बल्कि उनकी सुरक्षा और संरक्षण की जिम्मेदारी भी निभाई। इससे वन पंचायतों में सामुदायिक स्वामित्व और जिम्मेदारी की भावना मजबूत हुई।
उत्तराखंड में वर्तमान में 11,217 वन पंचायतें कार्यरत हैं। वर्ष 1930 में यहां पहली वन पंचायत का गठन हुआ था, जो सामुदायिक वन प्रबंधन की अनूठी परंपरा का प्रतीक है। वन पंचायत विभाग का मानना है कि यदि पौड़ी मॉडल की तरह अन्य जिलों में भी जनभागीदारी बढ़ाई जाए तो राज्य की हजारों वन पंचायतों में व्यापक सुधार संभव है। इसके लिए बैठकों, कार्यशालाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार की जा रही है। पंचायत प्रतिनिधियों को पौड़ी की सफल वन पंचायतों का भ्रमण कराने की भी योजना है, ताकि वे इस परिवर्तन को प्रत्यक्ष रूप से देख सकें। वन क्षेत्र के घना होने से वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में भी सुधार हुआ है। पहले जहां घटते वन क्षेत्र के कारण वन्यजीवों का जीवन प्रभावित हो रहा था, वहीं अब उन्हें सुरक्षित और प्राकृतिक वातावरण मिल रहा है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में कमी आने की उम्मीद जताई जा रही है। घने जंगलों और पुनर्जीवित जल स्रोतों ने क्षेत्र की जैव विविधता को भी सुदृढ़ किया है।
पौड़ी की वन पंचायतों का अनुभव यह साबित करता है कि योजनाओं से अधिक महत्वपूर्ण लोगों की सक्रिय भागीदारी है। जब ग्रामीण स्वयं संरक्षण की जिम्मेदारी लेते हैं, तो परिणाम स्थायी और प्रभावी होते हैं। पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में जल और जंगल जीवनरेखा हैं। ऐसे में सामुदायिक प्रयासों से तैयार हुआ यह मॉडल न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि सामाजिक एकजुटता और सामूहिक शक्ति का भी सशक्त उदाहरण बनकर उभरा है। यदि इसी प्रकार जनसहभागिता को व्यापक स्तर पर बढ़ावा मिलता रहा, तो आने वाले समय में राज्य की वन पंचायतें हरियाली, जल संरक्षण और जैव विविधता की नई मिसाल कायम कर सकती हैं।