देवभूमि उत्तराखंड में माउंटेन ट्रेल्स से साहसिक पर्यटन को मिलेगी नई रफ्तार..
उत्तराखंड: विश्वस्तरीय ट्रेकिंग और हाइकिंग के लिहाज से मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड को हमेशा से ही अपार संभावनाओं वाला क्षेत्र माना जाता रहा है। बर्फ से ढकी चोटियां, दुर्गम पहाड़ी रास्ते और विविध भूगोल राज्य को साहसिक पर्यटन के शौकीनों के लिए खास बनाते हैं। वर्तमान में उत्तराखंड में 81 पर्वत शिखर पर्वतारोहण और ट्रेकिंग के लिए खुले हैं, जिन पर लगभग 100 माउंटेन ट्रेल्स संचालित हो रहे हैं। इन संभावनाओं को देखते हुए राज्य सरकार पहले से ही पर्वतारोहण, ट्रेकिंग और हाइकिंग जैसी साहसिक पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में काम कर रही है। इसी कड़ी में अब केंद्र सरकार ने आम बजट में जिन राज्यों में माउंटेन ट्रेल विकसित करने की घोषणा की है, उनमें उत्तराखंड को भी शामिल किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, केंद्र के सहयोग से राज्य में ट्रेकिंग और हाइकिंग गतिविधियों के संचालन, प्रबंधन और बुनियादी सुविधाओं को बड़ा सहारा मिलेगा।
भौगोलिक दृष्टि से उत्तराखंड का स्वरूप इसे अन्य राज्यों से अलग बनाता है। चीन और नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से सटे 13 जिलों वाले इस राज्य में नौ जिले पूरी तरह पर्वतीय, दो जिले पर्वतीय-मैदानी मिश्रित और दो जिले विशुद्ध रूप से मैदानी भूगोल वाले हैं। खासकर उच्च हिमालयी क्षेत्रों की हिमाच्छादित चोटियां लंबे समय से देश-विदेश के साहसिक पर्यटकों को आकर्षित करती रही हैं। हालांकि ट्रेकिंग और पर्वतारोहण के बढ़ते क्रेज के साथ चुनौतियां भी सामने आई हैं। बढ़ती पर्यटक संख्या के कारण ट्रेल्स पर कचरा प्रबंधन एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। इसके अलावा, दुर्गम क्षेत्रों में राह भटकने की स्थिति में पर्यटकों की सुरक्षा भी एक अहम मुद्दा है। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार अब ट्रेकिंग और पर्वतारोहण गतिविधियों के लिए नियमावली और मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
केंद्र सरकार द्वारा माउंटेन ट्रेल विकास की घोषणा से उत्तराखंड को इन चुनौतियों से निपटने में भी मदद मिलने की उम्मीद है। ट्रेल्स के बेहतर चिन्हांकन, डिजिटल मैपिंग, रेस्क्यू सिस्टम, स्थानीय गाइड्स के प्रशिक्षण और पर्यावरण संरक्षण जैसे पहलुओं पर काम को गति मिल सकती है। पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि इस पहल से उत्तराखंड में साहसिक पर्यटन को नए आयाम मिलेंगे। इसके साथ ही स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, पोर्टर, होम-स्टे संचालक और ट्रेकिंग से जुड़ी सेवाओं में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। कुल मिलाकर, माउंटेन ट्रेल्स के विकास की यह पहल उत्तराखंड को साहसिक पर्यटन के वैश्विक मानचित्र पर और मजबूत स्थान दिलाने की दिशा में अहम साबित हो सकती है।
ये होंगे काम..
माउंटेन ट्रेल इस तरह से विकसित होंगी, जिससे वनस्पतियों व वन्यजीवों को खतरा न हो
कचरा प्रबंधन इन ट्रेल का अनिवार्य हिस्सा होगा।
गाइड, होम स्टे को बढ़ावा देकर स्थानीय समुदायों के लिए रोजगार।
किसी भी माउंटेन ट्रेल पर एक समय में सैलानियों की संख्या की जाएगी नियंत्रित।
यह होंगे लाभ..
प्लास्टिक पाबंदी
पर्यावरण अनुकूल शौचालय
प्रशिक्षित गाइड व डिजिटल नालेज ग्रिड
बर्ड वाचिंग ट्रेल भी बनेंगे, प्राचीन पैदल मार्गों के भी बहुरेंगे दिन
केंद्र और राज्य सरकार की ओर से माउंटेन ट्रेल्स के विकास की पहल के बीच अब उत्तराखंड में बर्ड वॉचिंग ट्रेल्स को भी अलग पहचान देने की तैयारी शुरू हो गई है। इससे राज्य में साहसिक पर्यटन के साथ-साथ इको-टूरिज्म और नेचर-बेस्ड टूरिज्म को नया आयाम मिलने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल उत्तराखंड को प्रकृति-आधारित पर्यटन के अंतरराष्ट्रीय केंद्र के रूप में स्थापित करने में मददगार साबित हो सकती है। जैव विविधता के लिहाज से उत्तराखंड देश के सबसे समृद्ध राज्यों में गिना जाता है। भारत में पाई जाने वाली लगभग 1300 पक्षी प्रजातियों में से 700 से अधिक प्रजातियां उत्तराखंड में देखी जाती हैं। यही वजह है कि राज्य के जंगल, ऊंचाई वाले घास के मैदान, नदियों के किनारे और झीलें लंबे समय से पक्षी प्रेमियों और शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र रहे हैं।
बर्ड वॉचिंग ट्रेल्स के औपचारिक विकास से इन क्षेत्रों को संरचित और सुरक्षित तरीके से पर्यटन से जोड़ा जा सकेगा। इस पहल का असर केवल नए ट्रेल्स तक सीमित नहीं रहेगा। लंबे समय से उपेक्षित पड़े चारधाम यात्रा के प्राचीन पैदल मार्गों और स्वामी विवेकानंद से जुड़े ऐतिहासिक यात्रा रूट्स के पुनर्जीवित होने की उम्मीद भी जगी है। इन पारंपरिक मार्गों को ट्रेकिंग, हाइकिंग और नेचर वॉक के रूप में विकसित किया जा सकता है, जिससे धार्मिक, आध्यात्मिक और प्रकृति-आधारित पर्यटन को एक साथ जोड़ा जा सकेगा। पर्यटन विशेषज्ञों के अनुसार, इस तरह के रूट्स के पुनरुद्धार से पर्यटकों को चारधाम यात्रा का वैकल्पिक और शांत अनुभव मिलेगा, जबकि स्थानीय ग्रामीणों को होम-स्टे, गाइडिंग, पोर्टर और अन्य सेवाओं के जरिए रोजगार के अवसर मिलेंगे। इससे पर्यटन का दबाव भी कुछ हद तक संतुलित होगा और संवेदनशील क्षेत्रों में भीड़ नियंत्रण में मदद मिलेगी।