उत्तराखंड

उत्तराखंड में बढ़ेगा जड़ी-बूटी उत्पादन, किसानों को प्रोत्साहित करने की बनेगी रणनीति..

उत्तराखंड में बढ़ेगा जड़ी-बूटी उत्पादन, किसानों को प्रोत्साहित करने की बनेगी रणनीति..

 

 

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध जड़ी-बूटियों के संरक्षण और बेहतर व्यावसायिक उपयोग को लेकर सरकार ने पहल तेज कर दी है। आयुष विभाग अब जड़ी-बूटी उत्पादन से जुड़े किसानों को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ औषधीय पौधों के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में भी काम करेगा। इसके लिए आयुष विभाग, उद्यान विभाग और जड़ी-बूटी केंद्र समेत संबंधित विभागों के बीच समन्वय बनाकर विस्तृत रोडमैप तैयार किया जाएगा। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में औषधीय और उपयोगी वनस्पतियां पाई जाती हैं। इनमें करीब 2,300 ऐसी प्रजातियां हैं, जिनका इस्तेमाल लंबे समय से औषधियों के निर्माण में किया जाता रहा है। इन वनस्पतियों की उपलब्धता को देखते हुए अब इनके संरक्षण के साथ उत्पादन और उपयोग को व्यवस्थित तरीके से बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। आयुष विभाग ने इस दिशा में प्रारंभिक खाका तैयार किया है। जल्द ही उद्यान विभाग, जड़ी-बूटी केंद्र और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारियों के साथ बैठक कर इस खाके को विस्तृत रोडमैप का रूप दिया जाएगा।

47 हजार किसान पहले से जुड़े

राज्य में जड़ी-बूटी और सगंध खेती से करीब 47 हजार किसान पहले से जुड़े हुए हैं। ऐसे में विभाग का फोकस किसानों को इस क्षेत्र में और अधिक अवसर उपलब्ध कराने पर रहेगा। रोडमैप में यह तय किया जाएगा कि किसानों को किस तरह प्रोत्साहित किया जाए और आयुष विभाग उनकी उपज को औषधीय क्षेत्र से जोड़ने में किस तरह भूमिका निभा सकता है। प्रदेश को आयुष प्रदेश के रूप में विकसित करने की दिशा में 186 गांवों को जड़ी-बूटी ग्राम के तौर पर चिन्हित किया गया है। इनमें से 13 गांव आयुष ग्राम के रूप में विकसित किए जाने के लिए तैयार बताए जा रहे हैं।

तेजपत्ता, तिमूर और चंदन भी सब्सिडी के दायरे में

जड़ी-बूटी और सगंध प्रजातियों की खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार पहले ही अनुदान में बढ़ोतरी कर चुकी है। कुछ प्रजातियों पर सब्सिडी को ढाई से तीन गुना तक बढ़ाया गया है। किसानों के लिए अधिकतम एक लाख रुपये तक के अनुदान या दो हेक्टेयर क्षेत्रफल की सीमा तय की गई है। इसके साथ ही तेजपत्ता, तिमूर और चंदन जैसी प्रजातियों को भी सब्सिडी के दायरे में शामिल किया गया है। इससे किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ औषधीय और सगंध पौधों की खेती की ओर बढ़ने का अवसर मिलेगा।

संरक्षण के साथ बाजार से जोड़ने पर जोर

आयुष विभाग की प्रस्तावित योजना में सिर्फ जड़ी-बूटियों के संरक्षण तक सीमित रहने के बजाय उनके बेहतर इस्तेमाल पर भी जोर रहेगा। किसानों से प्राप्त होने वाली औषधीय उपज को उचित बाजार, प्रसंस्करण और आयुष क्षेत्र से जोड़ने की संभावनाओं पर भी चर्चा की जाएगी। अधिकारियों के अनुसार अगले कुछ दिनों में आयुष, उद्यान और जड़ी-बूटी केंद्र के अधिकारियों के साथ बैठक प्रस्तावित है। बैठक के बाद किसानों को प्रोत्साहन देने, औषधीय पौधों के संरक्षण और उनके बेहतर उपयोग को लेकर आगे की कार्ययोजना तय की जाएगी।

 

 

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