मतदाता सूची पुनरीक्षण में सामने आई गड़बड़ी, चुनाव आयोग ने 19 लाख लोगों से मांगा जवाब..
उत्तराखंड: उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान सामने आई विसंगतियों के बाद चुनाव आयोग ने बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी है। राज्य के करीब 19.04 लाख मतदाताओं को नोटिस जारी किए गए हैं। इन नोटिसों में मतदाता पंजीकरण के दौरान उपलब्ध कराई गई जानकारी में पाई गई त्रुटियों और विसंगतियों का उल्लेख किया गया है। आयोग ने संबंधित मतदाताओं को निर्धारित तिथि पर उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। निर्वाचन अधिकारियों के अनुसार एसआईआर प्रक्रिया के दौरान कई मामलों में मतदाताओं के नाम, आयु, पारिवारिक संबंधों और अन्य विवरणों में असंगतियां सामने आई हैं। इन मामलों की जांच के लिए संबंधित मतदाताओं को व्यक्तिगत नोटिस भेजे गए हैं, ताकि तथ्यों का सत्यापन किया जा सके और मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिरहित बनाया जा सके।
नोटिस में क्या है?
चुनाव आयोग की ओर से जारी नोटिस में संबंधित मतदाता का नाम, ईपीआईसी (मतदाता पहचान पत्र) नंबर, विधानसभा क्षेत्र, मतदान केंद्र का भाग संख्या, मतदाता सूची में क्रम संख्या और पूरा पता दर्ज किया गया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि किस कारण से संबंधित व्यक्ति को नोटिस जारी किया गया है और उसके रिकॉर्ड में किस प्रकार की विसंगति पाई गई है। नोटिस में सुनवाई की तिथि, समय और स्थान का भी उल्लेख किया गया है। आयोग ने मतदाताओं से निर्धारित समय पर उपस्थित होकर अपने पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करने को कहा है।
दस्तावेजों का होगा स्वतंत्र सत्यापन
निर्वाचन विभाग ने साफ किया है कि सुनवाई के दौरान मतदाता जो भी दस्तावेज प्रस्तुत करेंगे, उनका स्वतंत्र रूप से सत्यापन कराया जाएगा। यदि कोई व्यक्ति अपनी आयु, पहचान या अन्य जानकारी के समर्थन में शैक्षिक प्रमाणपत्र, जन्म प्रमाणपत्र या अन्य सरकारी दस्तावेज जमा करता है तो संबंधित विभाग या बोर्ड से उसकी पुष्टि कराई जाएगी। आयोग का कहना है कि केवल दस्तावेज जमा करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उनकी प्रमाणिकता की भी जांच की जाएगी। यदि जांच के दौरान कोई दस्तावेज फर्जी, मनगढ़ंत या गलत पाया जाता है तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची में जानबूझकर गलत जानकारी देना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति ने जानबूझकर गलत या भ्रामक जानकारी देकर मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने या किसी अन्य उद्देश्य से गलत घोषणा की है, तो उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा-217 के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक को जानबूझकर झूठी सूचना देता है और उससे किसी अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुंचने की संभावना बनती है, तो ऐसे मामले में एक वर्ष तक की कैद, 10 हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों दंड दिए जा सकते हैं। इसके साथ ही लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा-31 के तहत भी झूठी घोषणा करना दंडनीय अपराध है। इस प्रावधान के तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने, संशोधन कराने या हटाने के लिए गलत जानकारी देने पर एक वर्ष तक का कारावास, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।निर्वाचन विभाग ने सभी संबंधित मतदाताओं से अपील की है कि वे नोटिस को गंभीरता से लें और निर्धारित तिथि पर सुनवाई में उपस्थित होकर सही एवं प्रमाणिक दस्तावेज प्रस्तुत करें। अधिकारियों का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं, बल्कि मतदाता सूची को पूरी तरह शुद्ध और पारदर्शी बनाना है।
सहायक मुख्य निर्वाचन अधिकारी मस्तू दास ने बताया कि आयोग प्रत्येक मामले की निष्पक्ष जांच करेगा। यदि किसी मतदाता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज सही पाए जाते हैं तो आवश्यक संशोधन कर दिए जाएंगे। वहीं, यदि जांच में कोई दस्तावेज फर्जी या भ्रामक पाया जाता है तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। निर्वाचन विभाग का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान का उद्देश्य राज्य की मतदाता सूची को अद्यतन और त्रुटिरहित बनाना है, ताकि भविष्य में होने वाले चुनावों में केवल पात्र और सत्यापित मतदाता ही अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें।