आस्था के साथ रोजगार भी दे रही सरस्वती नदी..
माणा के परिवारों को मिल रहा लाखों का संबल..
उत्तराखंड: देश के प्रथम गांव माणा में बहने वाली पौराणिक सरस्वती नदी केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का महत्वपूर्ण साधन भी बन चुकी है। हर वर्ष बद्रीनाथ धाम की यात्रा शुरू होते ही गांव के दर्जनों परिवार सरस्वती नदी का जल श्रद्धालुओं तक पहुंचाने का कार्य शुरू कर देते हैं। छह माह तक चलने वाले यात्रा सीजन में यही गतिविधि कई परिवारों की आजीविका का प्रमुख आधार बन जाती है। माणा गांव में भीम पुल से लेकर सतोपंथ ट्रैक मार्ग तक कई स्थानों पर स्थानीय युवा, महिलाएं और बुजुर्ग श्रद्धालुओं को सरस्वती नदी का जल उपलब्ध कराते दिखाई देते हैं। छोटे और बड़े डिब्बों में पैक कर यह जल श्रद्धालुओं को उनकी आवश्यकता के अनुसार दिया जाता है। यात्रा सीजन के दौरान प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस जल को खरीदकर अपने घरों तक ले जाते हैं।
स्थानीय युवाओं का कहना है कि बद्रीनाथ यात्रा उनके लिए रोजगार का सबसे बड़ा अवसर लेकर आती है। सुबह से लेकर देर शाम तक वे श्रद्धालुओं को सरस्वती नदी का जल उपलब्ध कराते हैं। श्रद्धालु इस जल को धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और विशेष अवसरों पर उपयोग के लिए अपने साथ ले जाते हैं। कई श्रद्धालु इसे पवित्र प्रसाद के रूप में भी घर ले जाना पसंद करते हैं। गांव की महिलाओं के अनुसार सरस्वती नदी के जल की मांग लगातार बनी रहती है। देश के विभिन्न राज्यों से आने वाले श्रद्धालु इस जल को अपने परिवार और परिचितों के लिए भी खरीदते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यात्रा अवधि में गांव के 20 से अधिक परिवार प्रत्यक्ष रूप से इस कार्य से जुड़े रहते हैं और इससे उन्हें अच्छी आय प्राप्त होती है।
यात्रा सीजन के दौरान जल बिक्री से होने वाली आमदनी गांव की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। स्थानीय लोगों के अनुसार एक परिवार छह माह की यात्रा अवधि में दो से तीन लाख रुपये तक की आय अर्जित कर लेता है। यही कारण है कि बद्रीनाथ यात्रा का इंतजार माणा गांव के कई परिवार पूरे वर्ष करते हैं। हिमालय की गोद में स्थित माणा गांव में सरस्वती नदी को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। मान्यता है कि इस नदी का जल घर में सुख-समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु पितरों के तर्पण, धार्मिक अनुष्ठानों और विशेष पूजन कार्यों के लिए भी इस जल को अपने साथ ले जाते हैं।
माणा क्षेत्र में अलकनंदा और सरस्वती नदी का संगम स्थल ‘केशव प्रयाग’ भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। सरस्वती नदी के समीप स्थित मानसूर तीर्थ का जलस्रोत भी श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार इस जल का आचमन करने से वाणी संबंधी समस्याओं में लाभ मिलता है। इसी विश्वास के चलते हर वर्ष हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर जल ग्रहण करते हैं और अपने साथ भी ले जाते हैं।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों का मानना है कि यदि मानसूर तीर्थ और सरस्वती नदी के जल का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाए तो इसके गुणों के बारे में अधिक जानकारी सामने आ सकती है। इससे धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर भी विकसित हो सकते हैं। आज माणा गांव में सरस्वती नदी का पवित्र जल केवल श्रद्धा का प्रतीक नहीं, बल्कि पहाड़ के लोगों की मेहनत, स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की कहानी भी बन चुका है। बद्रीनाथ यात्रा के साथ जुड़ी यह परंपरा स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ-साथ क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को भी जीवित रखे हुए है।