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उत्तराखंड

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने की तैयारी, हर जिले में चिन्हित होंगे हॉटस्पॉट..

उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने की तैयारी..

हर जिले में चिन्हित होंगे हॉटस्पॉट..

 

 

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में जंगली जानवरों और इंसानों के बीच बढ़ते टकराव को रोकने के लिए अब जिला स्तर पर ठोस रणनीति तैयार की जाएगी। प्रदेश के सभी जिलों में मानव-वन्यजीव संघर्ष के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर उनकी मैपिंग की जाएगी। इन क्षेत्रों को हॉटस्पॉट के रूप में चिह्नित करने के साथ ही वहां संभावित घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी इंतजाम भी किए जाएंगे। इस काम के लिए जिलाधिकारी की अध्यक्षता में बहुविभागीय समितियां गठित की गई हैं, ताकि वन विभाग के साथ दूसरे विभाग भी मिलकर समस्या का समाधान तलाश सकें। प्रदेश में मानव-वन्यजीव संघर्ष लंबे समय से चिंता का विषय बना हुआ है। जंगलों के आसपास बसे गांवों, खेती वाले इलाकों और आबादी के नजदीक वन्यजीवों की आवाजाही से लोगों की सुरक्षा पर खतरा बना रहता है। कई बार जंगली जानवरों की मौजूदगी के कारण ग्रामीणों को रोजमर्रा के कामकाज और खेती-किसानी में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। ऐसे में सरकार की ओर से अब संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर वहां पहले से सतर्कता और सुरक्षा के उपाय लागू करने पर जोर दिया जा रहा है।

जिलाधिकारी की अध्यक्षता में काम करेगी समिति
मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम के लिए गठित जिला स्तरीय समिति की अध्यक्षता जिलाधिकारी करेंगे। इसमें वन विभाग, पुलिस, कृषि, उद्यान, शिक्षा, पशुपालन और नगर निकाय समेत विभिन्न विभागों के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है। समिति में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी), मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) और प्रभागीय वनाधिकारी (डीएफओ) सहित कुल 14 सदस्य रखे गए हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य अलग-अलग विभागों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करना है। वन्यजीवों की गतिविधियों पर निगरानी रखने से लेकर लोगों को सतर्क करने और किसी घटना की स्थिति में त्वरित कार्रवाई करने तक, समिति समन्वित तरीके से काम करेगी। इससे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार प्रभावी कदम उठाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

हॉटस्पॉट की मैपिंग से समय रहते मिलेगी चेतावनी
समिति की प्राथमिक जिम्मेदारियों में उन क्षेत्रों की पहचान करना शामिल है, जहां वन्यजीवों की आवाजाही और इंसानों के साथ टकराव की आशंका अधिक रहती है। हॉटस्पॉट की मैपिंग होने के बाद इन स्थानों पर निगरानी बढ़ाने और जोखिम कम करने के लिए विशेष कार्ययोजना तैयार की जा सकेगी। इन क्षेत्रों में जरूरत के अनुसार क्विक रिस्पांस टीम (QRT) की तैनाती भी की जा सकती है। इससे वन्यजीवों की मौजूदगी की सूचना मिलने पर संबंधित टीमें तेजी से मौके पर पहुंच सकेंगी। इसके साथ ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित कैमरों और अर्ली वार्निंग सिस्टम जैसी तकनीकों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया जाएगा। इन तकनीकों की मदद से वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रखने और संभावित खतरे की सूचना समय रहते लोगों तक पहुंचाने में सहायता मिल सकती है।

किसानों और स्कूली बच्चों को भी किया जाएगा जागरूक
मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए तकनीकी इंतजामों के साथ जनजागरूकता को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। समिति को स्थानीय लोगों, किसानों और स्कूली बच्चों के बीच जागरूकता गतिविधियां संचालित करने की जिम्मेदारी दी गई है। किसानों को खेतों में काम करते समय बरती जाने वाली सावधानियों और वन्यजीवों की मौजूदगी की स्थिति में अपनाए जाने वाले सुरक्षा उपायों की जानकारी दी जा सकती है। वहीं, स्कूली बच्चों को वन्यजीवों से सुरक्षित दूरी बनाए रखने और खतरे की स्थिति में जिम्मेदार अधिकारियों को सूचना देने के बारे में जागरूक किया जाएगा। इस पहल के जरिए लोगों को वन्यजीवों के व्यवहार और संभावित जोखिमों के प्रति सतर्क करने की कोशिश होगी, ताकि आमने-सामने की स्थिति बनने से पहले ही सावधानी बरती जा सके।

कई विभाग मिलकर तैयार करेंगे कार्ययोजना
मानव-वन्यजीव संघर्ष की समस्या का प्रभावी समाधान केवल वन विभाग के प्रयासों से संभव नहीं है। संवेदनशील क्षेत्रों में खेती, आबादी, यातायात और स्थानीय जरूरतों से जुड़े कई पहलू होते हैं। ऐसे में विभिन्न विभागों की भागीदारी से स्थानीय स्तर पर बेहतर योजना बनाने और आवश्यक संसाधनों का उपयोग करने में मदद मिल सकती है। समिति को विभागीय समन्वय, अपशिष्ट प्रबंधन और जनजागरूकता से जुड़े उपायों पर भी काम करना होगा। इस संबंध में संबंधित डीएफओ और विभागीय निदेशकों को पत्र भेजे गए हैं, ताकि जिला स्तर पर व्यवस्था को आगे बढ़ाया जा सके।

अब जमीन पर प्रभावी क्रियान्वयन की चुनौती
प्रदेश के सभी जिलों में हॉटस्पॉट चिह्नित होने के बाद उन क्षेत्रों की जरूरतों के मुताबिक कदम उठाना अहम होगा। निगरानी व्यवस्था, त्वरित प्रतिक्रिया, तकनीकी संसाधनों और स्थानीय लोगों की भागीदारी के बेहतर तालमेल से संघर्ष की घटनाओं के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। अब इस नई व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कितनी प्रभावी ढंग से होती है और वहां प्रस्तावित उपायों को कितनी तेजी से लागू किया जाता है। यदि विभागों के बीच समन्वय मजबूत रहता है, तो यह पहल उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

 

 

 

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