किसानों की आय बढ़ाने की पहल, मौन पालन नीति को कैबिनेट की हरी झंडी..
उत्तराखंड: प्रदेश सरकार ने किसानों की आय में स्थायी बढ़ोतरी के उद्देश्य से मौन पालन नीति 2026 को मंजूरी दे दी है। कैबिनेट की स्वीकृति के साथ ही अब राज्य में मधुमक्खी पालन को संगठित, वैज्ञानिक और व्यावसायिक रूप से विकसित करने की दिशा में ठोस पहल शुरू हो गई है। सरकार का मानना है कि पारंपरिक खेती के साथ मौन पालन को जोड़कर किसानों को अतिरिक्त आय का सशक्त स्रोत उपलब्ध कराया जा सकता है। इस महत्वाकांक्षी योजना को छह वर्षों में दो चरणों में लागू किया जाएगा। कुल 111 करोड़ रुपये की लागत वाली इस योजना का लक्ष्य राज्य के 25 हजार किसानों को प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित करना है। योजना विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है, ताकि कम संसाधनों में भी वे अतिरिक्त आय अर्जित कर सकें।
योजना के तहत किसानों को 80 प्रतिशत सब्सिडी पर कुल 1 लाख 27 हजार मौन बॉक्स उपलब्ध कराए जाएंगे। इससे किसानों को शुरुआती निवेश का बोझ कम होगा और वे आसानी से मधुमक्खी पालन शुरू कर सकेंगे। सरकार का उद्देश्य है कि अधिक से अधिक किसान इस गतिविधि से जुड़ें और इसे स्वरोजगार के रूप में अपनाएं। मधुमक्खी पालन केवल शहद उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कृषि उत्पादकता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। परागण की प्रक्रिया से फल, सब्जियों और तिलहन फसलों के उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि होती है, जिससे किसानों की कुल आय में इजाफा होता है। राज्य के मैदानी और पर्वतीय क्षेत्रों की जलवायु को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग प्रजातियों के माध्यम से मौन पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है। मैदानी जिलों में Apis mellifera प्रजाति की मधुमक्खियों का पालन किया जा रहा है, जो व्यावसायिक स्तर पर अधिक शहद उत्पादन के लिए जानी जाती है। वहीं पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल Apis cerana प्रजाति को प्राथमिकता दी जा रही है।
नीति के अंतर्गत किसानों को केवल मौन बॉक्स ही नहीं दिए जाएंगे, बल्कि उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण, आधुनिक पालन विधियों की जानकारी, रोग प्रबंधन, शहद प्रसंस्करण और पैकेजिंग संबंधी प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाएगा। साथ ही उत्पाद के विपणन की व्यवस्था सुनिश्चित कर बाजार तक पहुंच बनाने में भी सहयोग दिया जाएगा। सरकार का लक्ष्य है कि उत्तराखंड को शहद उत्पादन के क्षेत्र में मजबूत पहचान मिले और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति प्राप्त हो। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है तो आने वाले वर्षों में यह किसानों के लिए आय का स्थायी और लाभकारी विकल्प साबित हो सकती है।