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उत्तराखंड

पिथौरागढ़ की पारंपरिक बुनकारी में आधुनिकता का मेल..

पिथौरागढ़ की पारंपरिक बुनकारी में आधुनिकता का मेल..

महिला समूहों ने कालीनों को दिया नया रूप..

 

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ की पारंपरिक बुनकारी अब नए प्रयोगों के जरिए अपनी अलग पहचान बना रही है। मुनस्यारी और धारचूला की महिला बुनकरों ने अपनी कलात्मक प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए ऊनी कालीनों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सीएम पुष्कर सिंह धामी, राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ और ‘सत्यमेव जयते’ की आकृतियां तैयार की हैं। इन कालीनों में स्थानीय महिलाओं की मेहनत, हुनर और पारंपरिक कला की झलक देखने को मिलती है। सीएम पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में संचालित एक जनपद एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना के तहत जिले के ऊनी उत्पादों को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं। पारंपरिक बुनकारी को आधुनिक डिजाइन के साथ जोड़कर महिला समूह अपने उत्पादों को नया स्वरूप दे रहे हैं। इससे स्थानीय हस्तशिल्प को व्यापक पहचान दिलाने और महिलाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाने की संभावनाएं भी मजबूत हो रही हैं।

पारंपरिक दनकालीन बुनकारी को मिल रहा नया स्वरूप
पिथौरागढ़ की दनकालीन बुनकारी लंबे समय से यहां की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा रही है। खासतौर पर सीमांत क्षेत्रों में ऊन से उत्पाद तैयार करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। अब स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं इस हुनर को आगे बढ़ाते हुए कालीनों में नए डिजाइन और कलात्मक आकृतियों का प्रयोग कर रही हैं। महिला बुनकरों द्वारा तैयार किए जा रहे उत्पादों में पारंपरिक शिल्प के साथ आधुनिकता का मेल देखने को मिल रहा है। ऊन के अलग-अलग रंगों और धागों के इस्तेमाल से तस्वीरों व प्रतीकों को कालीनों पर उकेरना मेहनत और बारीकी का काम है। ऐसे उत्पाद स्थानीय कला को नया आयाम देने के साथ बाजार में अलग पहचान बनाने की क्षमता भी रखते हैं।

ओडीओपी योजना से स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा
एक जनपद एक उत्पाद योजना के तहत जिले के पारंपरिक उत्पादों को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जा रहा है। जिला उद्योग केंद्र के मार्गदर्शन में महिला समूहों को बाजार की मांग के अनुरूप उत्पाद तैयार करने और अपने हुनर को व्यावसायिक गतिविधियों से जोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। बदलते बाजार के अनुसार डिजाइन तैयार करने से पारंपरिक उत्पादों को नए ग्राहकों तक पहुंचाने के अवसर बढ़ सकते हैं। इसके साथ ही स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और पारंपरिक कौशल का उपयोग कर महिलाएं अपनी आजीविका को मजबूत करने की दिशा में काम कर रही हैं।

महिला सशक्तिकरण के साथ विरासत संरक्षण पर जोर
स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं के लिए कालीन निर्माण केवल पारंपरिक कला को बचाए रखने का माध्यम नहीं है, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। अपने हुनर के जरिए महिलाएं स्थानीय उत्पादों को नया रूप दे रही हैं और क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ा रही हैं। पिथौरागढ़ की महिला बुनकरों की यह पहल दिखाती है कि पारंपरिक हस्तशिल्प को आधुनिक जरूरतों के अनुरूप विकसित कर रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। स्थानीय कला, महिला उद्यमिता और बाजार की मांग के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होने से जिले के ऊनी उत्पादों को आगे बढ़ने का अवसर मिल सकता है।

 

 

 

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