उत्तराखंड

हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी टीईटी में आरक्षण, शिक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल..

हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी टीईटी में आरक्षण, शिक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल..

 

 

उत्तराखंड: उत्तराखंड में शिक्षक भर्ती और शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) में आरक्षण को लेकर शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गई है। शादी के बाद अन्य राज्यों से आकर उत्तराखंड में बसने वाली अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग की महिलाओं को लेकर विभाग की दोहरी नीति पर सवाल खड़े हो रहे हैं। दरअसल, हाईकोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि विवाह के बाद उत्तराखंड में निवास करने वाली अन्य राज्यों की एससी-एसटी महिलाओं को राज्य स्तरीय आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। इस संबंध में दायर याचिका को न्यायालय ने खारिज करते हुए आरक्षण से जुड़ा कानूनी पक्ष साफ कर दिया था। इसके बावजूद शिक्षा विभाग की ओर से पहले शिक्षक भर्ती में ऐसी महिलाओं से न केवल आवेदन स्वीकार किए गए, बल्कि चयन प्रक्रिया पूरी कर उन्हें नियुक्ति भी दे दी गई। हाईकोर्ट के फैसले के बाद स्थिति में बदलाव हुआ और अब इन महिलाओं को शिक्षक भर्ती में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा रहा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) में अब भी उन्हें आरक्षण का लाभ मिल रहा है।

इस विरोधाभासी व्यवस्था ने शिक्षा विभाग की नीतियों और निर्णय प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब एक ही विषय पर हाईकोर्ट का स्पष्ट निर्णय मौजूद है, तो भर्ती और पात्रता परीक्षा में अलग-अलग मानक अपनाना न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि इससे भविष्य में कानूनी विवाद भी बढ़ सकते हैं। टीईटी में आरक्षण मिलने के बाद यदि अभ्यर्थी शिक्षक भर्ती में आरक्षण से वंचित हो जाते हैं, तो इससे अभ्यर्थियों में भ्रम और असंतोष की स्थिति बनना स्वाभाविक है। शिक्षा विभाग की इस नीति को लेकर अब यह सवाल उठने लगे हैं कि आखिर आरक्षण से संबंधित नियमों को एक समान रूप से लागू क्यों नहीं किया जा रहा। क्या विभाग हाईकोर्ट के आदेशों की अलग-अलग व्याख्या कर रहा है, या फिर नियमों के अनुपालन में कहीं न कहीं गंभीर चूक हो रही है। मामले ने तूल पकड़ लिया है और संभावना जताई जा रही है कि आने वाले समय में इस दोहरी व्यवस्था के खिलाफ फिर से न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है। फिलहाल, शिक्षा विभाग की ओर से इस विरोधाभास पर कोई स्पष्ट और आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है।

टीईटी में आरक्षण का लाभ लेने वाली कुछ महिलाएं अब शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया में भी शामिल हो रही हैं, जिससे चयन प्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं। भर्ती प्रक्रिया के दौरान इन्हें आरक्षित वर्ग में चयनित न करते हुए सामान्य वर्ग की सूची में शामिल किया जा रहा है। इस स्थिति के चलते पूर्व में 2900 पदों पर हुई शिक्षक भर्ती में ऐसी कुछ महिलाओं का चयन हुआ था। लेकिन हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद शिक्षा विभाग ने उनके नियुक्ति पत्र जारी नहीं किए। न्यायालय के निर्णय के अनुसार विवाह के बाद उत्तराखंड में बसने वाली अन्य राज्यों की महिलाओं को राज्य स्तरीय आरक्षण का लाभ नहीं दिया जा सकता। इसके बावजूद वर्तमान में चल रही 1670 पदों की शिक्षक भर्ती में भी इसी श्रेणी की महिलाओं ने आवेदन किया है। इससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि जब हाईकोर्ट का फैसला सामने आ चुका है, तो टीईटी और शिक्षक भर्ती में नियमों को एक समान तरीके से लागू क्यों नहीं किया जा रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी अभ्यर्थी को टीईटी में आरक्षण का लाभ दिया जाता है, लेकिन भर्ती के समय उसे सामान्य वर्ग में रखा जाता है, तो यह न केवल भ्रम की स्थिति पैदा करता है बल्कि चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी असर डालता है। इससे प्रभावित अभ्यर्थियों के साथ-साथ अन्य उम्मीदवारों के अधिकारों को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। शिक्षा विभाग की ओर से अब तक इस पूरे मामले पर कोई ठोस और स्पष्ट नीति सार्वजनिक नहीं की गई है। ऐसे में यह मामला भविष्य में फिर से कानूनी चुनौती का रूप ले सकता है। वर्तमान हालात में विभाग की दोहरी व्यवस्था ने शिक्षक भर्ती प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना दिया है।

 

टीईटी पास करने के लिए लाने होते हैं इतने अंक..

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के अभ्यर्थियों को टीईटी उत्तीर्ण करने के लिए न्यूनतम 60 अंक लाने होते हैं। वहीं सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए यह सीमा काफी अधिक, यानी 90 अंक निर्धारित है। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के अभ्यर्थियों को 75 अंक प्राप्त करने होते हैं। अंकों का यह अंतर आरक्षण नीति के तहत तय किया गया है, लेकिन इसी व्यवस्था का दुरुपयोग होने की आशंका अब सामने आने लगी है। टीईटी के लिए आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन होती है, जिसमें अभ्यर्थी अपनी श्रेणी स्वयं दर्ज करते हैं। इस दौरान यह जांच नहीं हो पाती कि अभ्यर्थी द्वारा चुनी गई श्रेणी राज्य के नियमों के अनुरूप है या नहीं। हालांकि काउंसलिंग के समय ऐसे मामलों को चिन्हित किया जा सकता है, लेकिन तब तक कई बार पूरी चयन प्रक्रिया प्रभावित हो चुकी होती है। शिक्षा विभाग से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस पूरी समस्या का स्थायी समाधान जाति प्रमाण पत्रों की सख्त और समय पर जांच में छिपा है। यदि जाति प्रमाण पत्र जारी करने से पहले स्थानीय प्रशासन स्तर पर पूरी तरह सत्यापन किया जाए, तो अपात्र अभ्यर्थियों को प्रारंभिक स्तर पर ही रोका जा सकता है।

 

 

 

 

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