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आखिर क्या हैं शिव द्वार का प्रहरी कीर्तिमुख, जो है सभी देवताओं से ऊपर..

आखिर क्या हैं शिव द्वार का प्रहरी कीर्तिमुख, जो है सभी देवताओं से ऊपर..

 

 

 

 

 

 

 

 

भारतीय मंदिरों में एक ऐसा मुख आपको जरूर दिखाई देता होगा जो प्रत्येक भक्त के मन में कौतुहल जगाता है। जिसे देखकर वे आगे बढ़ जाते हैं और मन में प्रश्न रहता है कि ऐसी भयानक आकृति यहाँ क्यों स्थापित की गई

 

धर्म-संस्कृति: भारतीय मंदिरों में एक ऐसा मुख आपको जरूर दिखाई देता होगा जो प्रत्येक भक्त के मन में कौतुहल जगाता है। जिसे देखकर वे आगे बढ़ जाते हैं और मन में प्रश्न रहता है कि ऐसी भयानक आकृति यहाँ क्यों स्थापित की गई? फ़िर सोचते हैं कि शिवालयों में भयावह आकृति शिव जी के गण की होगी। यह मुखाकृति शिवालयों में द्वारपट, स्तंभों, भित्तियों में दिखाई देती है। इस आकृति को शिल्पकार अपनी कल्पना शक्ति के अनुसार भयावह निर्मित करते थे।

देखने से प्रतीत होता है कि ये किसी राक्षस की प्रतिमा है। यह आकृति शिवालयों के साथ जैन मंदिरों के शिल्प में भी पाई जाती है। खजुराहो के पार्श्वनाथ मंदिर में भी इस मुखाकृति को मंदिर शिल्प में स्थान दिया गया है। बहुत से भारतीय मंदिरों में मुख्य द्वार के ऊपर या गर्भगृह के द्वार पर धड़रहित एक डरावना सिर आपको घूरता या मुस्कुराता मिलेगा। तो आईये बताते हैं आपको कि क्या है इस मुख के पीछे की कहानी ।

आपको बता दे कि ये कहानी शिवपुराण में आती हैं। एक बार एक योगी थे जिनको साधना से कुछ शक्तियां मिल गई जिससे वह बहुत सी चीजें कर सकते थे। वह किसी भी चीज को जला कर भस्म कर सकते थे। वह ऐसी कई चीजें कर सकते थे जो दूसरे लोग नहीं कर सकते थे। उनके अंदर इस बात का अहंकार आ गया था और वह खुद को सर्व शक्तिशाली महसूस करने लगे थे। फिर वह पूरे गर्व से जंगल में विचरण कर रहे थे, जहां शिव अपने पूरे उन्माद में थे।

योगी ने उन्हें देखा तो उनका मजाक उड़ाने लगे और उन्हें अपमानित करने लगे थे। फिर पूरी तरह जड़ अवस्था में मौजूद शिव अचानक से आग की तरह पूरी तरह सजग और सहज अवस्था में सामने आ गए क्योंकि उन्हें किसी चीज का नशा नहीं था, वह अपनी मर्जी से नशे में थे। जब भी उनका मन करता था तो वह अपनी मर्जी से नशे में होते हैं और डगमगाते हैं।

लेकिन एक बार उस स्थिति से बाहर आने के बाद, वह प्रचण्ड रूप में आ गए। जो कि योगी के लिए एक अचम्भे की बात थी। शिव क्रोध में थे और उसी समय शिव ने एक नया दानव पैदा किया और उससे कहा, ‘इस योगी को खा जाओ।’ दानव का आकार और प्रचंडता देखकर वह योगी शिव के पैरों पर गिरे और दया की भीख मांगने लगे। शिव नशे में थे, तो क्रोधित हो गए थे। लेकिन जैसे ही योगी उनके पैरों पर गिर पड़े तो वह करुणा से भर उठे और दानव से कहा कि उसे मत खाओ, तुम चले जाओ।

जिस पर दानव ने कहा कि ‘आपने मुझे बनाया ही इस योगी को खाने के लिए था। अब आप उसे खाने से मना कर रहे हैं। तो मैं क्या करूं? मुझे बनाया ही इस मकसद से गया था।’ लेकिन शिव फिर से अपनी उन्मत्त अवस्था में पहुंच गए थे, उसी मनोदशा में उन्होंने दानव को कहा कि तुम अपने आप को खा जाओ।शिव के कहने पर दानव खुद को खाने लग गया। जब शिव पीछे की और देखने लगे तो उस समय तक दानव ने खुद को खा लिया था, उसने अपने शरीर का सारा हिस्सा खा लिया था।

केवल चेहरा बचा हुआ था और दो हाथ उसके मुंह में जा रहे थे, सिर्फ दो हाथ ही खाने के लिए बचे हुए थे। शिव ने यह देखा और कहा, ‘अरे रुको, तुम तो एक यशस्वी मुख हो।’ बाकी सब कुछ समाप्त हो चुका था, सिर्फ चेहरा बचा हुआ था, इसलिए उन्होंने कहा, ‘तुम इस धरती, इस पूरे अस्तित्व के सबसे यशस्वी मुख हो।’ क्योंकि शिव द्वारा उन्मत्त अवस्था में कहे जाने पर कि ‘अपने आप को खा लो’, उसने तत्काल आज्ञा पालन किया था।

इसलिए शिव ने कहा, ‘तुम सभी देवताओं से ऊपर हो।’ यही वजह है कि आज अगर आप किसी भी भारतीय मंदिर में जाएं, तो आप देवताओं के ऊपर इस मुख को देखेंगे, जिसमें दो हाथ मुंह के अंदर जा रहे होते हैं। उसे कीर्तिमुख के रूप में जाना जाता है। कीर्तिमुख का मतलब है एक यशस्वी चेहरा। इसलिए वह एक बहुत ही यशस्वी मुख है जो अपने आप को खाने के लिए उत्सुक है।

कहा जाता है कि वह समय,आकाश और सभी कुछ से ऊपर है। देवताओं से ऊपर होने का मतलब है कि वह इन सभी आयामों से ऊपर उठ चुका है क्योंकि देवता भी कुछ हकीकतों के अधीन होते हैं। वह इन सब के ऊपर है। यही वजह है कि आज अगर आप किसी भी भारतीय मंदिर में जाएं, तो वहां आपको देवताओं के ऊपर ये मुख जरूर दिखेगा।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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